काश इक बार मैं वक़्त बदल पाता। अपने सब सही को सही रहने देता और गलत को मिटाता

Tकाश इक बार मैं
वक़्त बदल पाता।
अपने सब सही को
सही रहने देता
और गलत को मिटाता।

ग़म के पन्नो वाली नाव
पहली बारिश में ही बहाता,
और खुशियों की रेलगाड़ी
पूरे आँगन में दौड़ाता।

जो अहम था मेरा
उसे माटी में दबाता,
और माफ़ी के कोपलों
वाली फूल फिर खिलाता।

काश मैं इक बार 
वक़्त बदल पाता।
अपने सब सही को 
सही रहने देता
और गलत को मिटाता।

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