दास्तान क्या सुनाऊँ

भीड़ में भागती इस दुनिया का किस्सा क्या सुनाऊँ,
कुछ चेहरे हैं खामोश से उनकी दास्तान
क्या सुनाऊँ।

ज़िन्दगी की रफ़्तार में एक अपनी ही
रवानी है,
रंगमंच के पीछे एक अलग ही
कहानी है।
मुकम्मल इश्क़ की सब मिसालें बहुत
देते हैं,
दरिया और बारिश ने राज़
संभाले बहुत हैं।
“फिर कभी” कहकर बारिश
था चला गया,
बस इसी इंतज़ार में हर बार,
दरिया ने खुद को फ़ना किया।

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