एक सवाल..

 

“देखो बाबू सिनेमा है, आपने ये सिनेमा देखी है?”

बड़े उत्साह से भरी हुई चमकती हुई आँखों के साथ,

चेहरे पर एक बच्चे की सी मुस्कान लिए हुए उस भीख माँगने वाली बूढ़ी औरत ने मुझसे पूछा|

उस एक सवाल ने मेरे अंदर सवालों का जैसे एक बांध ही तोड़ डाला हो|

17 साल पुरानी फिल्म को एक होटल के बाहर लगे पर्दे पर देखकर उसने पूछा|

सड़क के किनारे जमीन पर बैठकर वह अपने जीवन के अलग ही आनंद को महसूस कर रही थी|

यह जैसे मेरे और मुझ जैसे बहुत से लोगों के चेहरे पर एक आदरपूर्वक मारा हुआ तमाचा था|

हम वे लोग हैं जो अपने जीवन में प्रतिदिन अलग अलग बातों को लेकर शिकायतें लिए घूमते फिरते हैं,

शरीर ढकने को कपड़े हैं लेकिन फिर ब्रांड के कपड़ों का रोना रोते हैं|

पेट भरा हुआ है तब भी फाइव स्टार होटल में नही जा पाने का अफ़सोस हमें अंदर ही अंदर खाए जाता है|

दूसरों के जीवन को देखकर लालायित होना और दूसरों को अपनी श्रेष्ठता दिखने के लिए हम व्यर्थ ही दुखी रहते हैं|

हम यह नहीं देखते की जब हमारे पास सर छिपाने को छत है, तब बस अड्डे और रेलवे स्टेशन और फूटपाथ पर अब भी लोग सोते हैं हर रोज|

वो ना पंखे और कूलर को जानते हैं ना ही मखमल के गद्दे का इन्तेजार करते हैं|

जब दिन भर से जल रहे पेट की आग बुझती है तो बस वह कठोर धरती ही माँ की गोद जैसे महसूस होती है|

उनके जीवन में दुःख  खराब इन्टरनेट, फेसबुक पर लाइक और कमेंट की चिंता से नहीं आती,

उनके जीवन में दुःख भूख और प्यास से आती है|

जहाँ हम धर्म, समाज और जाती की चर्चा में मशगूल रहते हैं,

वे गरीब बस एक धर्म और जाती को समझते हैं वो है एक भूखे का दुसरे से इंसानियत का रिश्ता|

“चलो बाबू आज तो बड़े सालों बाद मैंने सिनेमा देखी, तुम तो बड़े सिनेमाघरों में देखते होगे आज यहाँ किन ख्यालों में खोकर बैठे रह गये?”

हमारे सोच पर एक और वार करती हुई वह अपना कटोरा लेकर आगे भीख मांगती हुई निकल गयी|

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