बदलाव: एक जिम्मेदारी हमारे हिस्से की

हम बंधक हैं अन्याय के..

न्याय के लिए हमारे महान क्रांतिकारियों ने अपने प्राणों की आहुति दे दी थी,क्योंकि अंग्रेजों को कोई अधिकार न था की वे हमारी भूमि पर  शासन करें|

उन्होंने अन्याय को स्वीकार नहीं किया|

लेकिन आज हम सब अन्याय के बंधक हैं क्योंकि हम अत्याचार के विरुद्ध आवाज नहीं उठाते|

हम सर्वोत्तम या बेहतर नहीं बल्कि जो सबसे कम बुरा हो उसे चुनते हैं|

हमें सब कुछ श्रेष्ठ चाहिए लेकिन उसके लिए हम खुद कदम नहीं बढ़ाते तथा इसके विपरीत हम शिकायतें करते हैं

और इन्तेजार करते हैं की कोई और आकर नायकों की तरह कार्य करे|

“राजनीती विकृत हो चुकी है” और “कुछ बदलने वाला नहीं”, ऐसी बहुत  सी बतेइन हम लोगों के मुंह से सुनते हैं जब वे इसे और अधिक व्यंगात्मक तरीके से कहते हैं,

ठीक उसी तरह जैसे शादी में दुल्हे का पिता व्यवस्था को लेकर लड़की वालों से बात कर रहा हो|

लोग “इस देश” जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, जैसे किसी सुदूर और सवश्रेष्ठ देश के निवासी हों|

यह देश आपका भी है,तो आप भी आगे आयें और जिम्मेदारी उठाएं “इस देश” को आगे बढ़ाने की|

लेकिन वे ऐसा नहीं करेंगे क्योंकि उन्हें आदत पड़ चुकी है बचपन से ऐसे ही जीने की|

मैं नहीं जनता की क्या कोई अपनी माँ के गर्भ से ही भ्रष्ट होता है नहीं?

पर ये भली-भांति जनता हूँ की यहाँ लोग घूस देना अपनी पहली सांस के साथ सीख कर आते हैं|

हम अपनी अगली पीढ़ी को तैयार कर रहे हैंकि वे भ्रष्टाचार और अन्याय को पोषित करें|

उन्हें शिक्षा देते हैं की उन्हें अपने काम से मतलब रखना चाहिए, और इस देश में कुछ बदलाव संभव नहीं है|

मेरा सवाल..

क्यों? क्यों कुछ नहीं हो सकता इस देश का?क्यों न हम सब अन्याय के विरुद्ध खड़े हों और वो कदम उठाएं जो सही हैं?

राजनीती में आयें, लोक सेवा, सेना तथा न्यायपालिका का हिस्सा बनें और बदलाव की लौ जलाएं|

या फिर उद्योग और व्यापर के क्षेत्र में क्रांति लाकर देश के विकाश में बड़े पैमाने पर योगदान दें|

अगर लोग दिग्विजय सिंह, कमाल आर खान और बरखा दत्त जैसे लोगों के पीछे चल सकते हैं तो वे आपसे भी प्रभावित होंगे,

क्योंकि वे उस नायक की भी प्रतीक्षा कर रहे हैं|

निराशा के शब्दों को उकेरना बंद करें और अपने हिस्से की जिम्मेदारी को उठाएं ताकि और आप बदलाव को देख पाएंगे|

अपनी लगन पर भरोसा रखें क्योंकि देखिये भोर होने को है|

 

 

 

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