भोर

फिर शाम होने को है,
एक तसल्ली दिल को भरे देती है।
के अँधेरा आने वाला है,
वो मुझसे मेरी पहचान नहीं पूछता।

शोहरत के संगीत को
मेरे तराने अभी कच्चे हैं,
मीठे ख्वाबों के लालच में
जरा देर से आँखें खोली हैं।

धोखे खाए हैं मैंने रौशनी से,
अंधियारों ने मुझे तसल्ली दी है।
जो आज रुक कर अपनी दास्तान
सुना डालूं,
तो मेरी “भोर” आनी पक्की है।

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