अपनों के चेहरे अब अंजान मालूम पड़ते हैं, झूठे दिलासे बेजान मालूम पड़ते हैं।

मुस्कान झूठी देखता हूँ।

झुलसते हुए इक शहर में 
मासूमियत को राख होते देखा है,
गलती से मैंने इंसानो को 
बेनक़ाब देखा है।

अपनों के चेहरे अब अंजान
मालूम पड़ते हैं,
झूठे दिलासे बेजान मालूम 
पड़ते हैं।

अब बस एक चीख मेरे दिल में
बुलंद हो चुकी है,
बुरे ख़्वाबों से नींद ने दोस्ती 
कर ली है।
सिसकती रातों में करवटों के साथ
चाँद को चलते देखता हूँ,
रूबरू होता हूँ जो अपने अक्स से
तो खुद की मुस्कान भी 
झूठी देखता हूँ।