मेरे कुछ अल्फ़ाज़ हैं बिखरे हुए जिन्हें मैं समेटना चाहता हूँ, जब चाहता हूँ इन्हें सुलझाना मैं खुद ही बिखर जाता हूँ

मेरे कुछ अल्फ़ाज़ हैं बिखरे हुए
जिन्हें मैं समेटना चाहता हूँ,
जब चाहता हूँ इन्हें सुलझाना
मैं खुद ही बिखर जाता हूँ।

मेरे भीतर हज़ार चींखें 
गहरी होती हैं,
फिर भी ये ख़ामोश बैठे हैं
जैसे दूधिया कोहरे में शाल
के दरख़्त।

ये दुआ में जैसे मेरी तन्हाई 
माँगते हों,
जैसे मेरे भीतर के कोलाहल 
को ये दफ़न कर देना चाहते हों।

इस जद्दोजहद में मैं हर बार उलझ जाता हूँ
कि ख़ामोश हो जाऊं और इनमें 
मिलकर खुद ही अल्फ़ाज़ बन जाऊं,
या ऊपर उठकर फिर से इन्हें
तराशता चला जाऊं।

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