मैं रब हूँ

ना मंदिर में बैठा,
ना मस्ज़िद में मैं हूँ।
गुरूद्वारे की चौकठ,
ना गिरजे में तय हूँ।
मैं रब हूँ मैं रब हूँ।

ना हिन्दू ने देखा,
ना मुसलमाँ ने जाना।
ना सिक्खों ने माना,
ना ईसाई ने पहचाना।

है इंसां का चर्चा,
जहाँ पर भी होता,

तेरे दिल की धड़कन,
और साँसों में मैं हूँ।

तू मुझमें ही सब है,
मैं तुझमें ही तब हूँ।

मैं रब हूँ मैं रब हूँ,

मैं रब हूँ मैं रब हूँ।

मेरे नाम पर हैं तलवारें
चमकती,
वो आंसू, लहू और वो लाशें
भी मेरी।

मुझे क्या है पाना?
दिला क्या ये देंगे?
कटे या झुके जो
वो सर भी है मेरा।

है इंसां का चर्चा
जहाँ पर भी होता,
उसी दिल उसी धड़कन
में मैं अब हूँ।

मैं रब हूँ मैं रब हूँ,
मैं रब हूँ मैं रब हूँ।

  1. सौजन्य : allpoetry.com

Leave a Reply