आग देखी है कभी? अपने पीछे भागते पतंगे को वो धीरे धीरे जलाती है। तुम भी तो वैसी ही हो ज़िन्दगी।

आग देखी है कभी?
अपने पीछे भागते पतंगे को
वो धीरे धीरे जलाती है।
तुम भी तो वैसी ही हो ज़िन्दगी।

तुम्हारे पीछे दौड़ता मैं
रोज़ थोड़ा जलता हूँ,
रोज़ थोड़ा मरता हूँ।
पर पतंगे को भी आग
ही चाहिए आख़िरी,
और मुझे भी बस तुम्हारा 
ही फ़ितूर है।

लहरें देखी हैं कभी??
चाँद को छूने की ख्वाहिश में
पूरे जोर से हाथ बढाती हैं,
और हर बार उसकी कदमों में
गिर कर फ़ना हो जाती हैं।

ना लहरें बाज़ आती हैं,
ना वो नादान पतंगा।
तुझे पता है??
मैं भी बिल्कुल वैसा ही हूँ।

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