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देशभक्ति

लकीरें

अरसे बीत गए खेतों के मेडों पर दौड़ लगाये हुए, कटी पतंगों के पीछे सरहदों को लांघा था हमने। मेरे बेबाक बंजारेपन को जाने किसकी नजर लग गयी, ऐ खुदा ! तेरे इस जहाँ में ये लकीरें क्यों खीच गयीं? तब सेवईयां भी हमारी थीं और लड्डू भी हमारे थे, …